Friday, 20 October 2017

प्यार की पहचान पार्ट-3

  1. प्यार करने वाले के लिए पूरा जीवन सादा और सरल हो जाता है। 
  2. प्यार कोई जरुरी नहीं दोनों तरफ से हो ।
  3. मुझे प्यार हो गया परंतु यह जरुरी नही उसे भी मुझसे प्यार है।
  4. प्यार हो जाने के बाद संसार का मोह छूट जाता है  कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रहती है।
  5. प्यार जब केवल एक तरफा हो जाता है तो न जीने का मन करता है और न ही मरने का ।
  6. मै भी चाहता हु की मै जिससे प्यार करता हु उसे भी बता दू बस यही मेरे जीवन की इच्छा है
  7. मैं उससे कैसे और कब बताऊ की मै तुमसे प्यार करता हूं  यदि मैं बता देता हु तो वह क्या महसूस करेगी और क्या वह मुझसे प्यार करेगी या नफरत।
  8.  मई उससे कुछ भी कहने से डरता हु।क्योकि कही वह मुझसे नफ़रत न करने लगे
  9. जब इस संसार में लोगो को पता चलेगा तो क्या लोग सोचेगे 
  10. मन करता है प्यार पर बहुत सारी किताबें लिख डालू
  11. क्या ऐसा प्यार मुझे ही हुआ है किसी और को नहीं।
  12. प्यार कैसे हो जाता है मैं अपने प्यार की कहानी आपको बताना चाहता हु जिससे मैं प्यार करता हु उसमे ख़ास बात क्या है यह तो मै नहीं जानता मुझे क्यों और कैसे प्यार हो गया और कब हो गया यह मै आपको कैसे बताऊ मेरे दिल में प्यार का एहसास है।
  13. क्या किसी के face और eyes को देखकर प्यार हो जाता है
  14. क्या उससे बातचीत के दौरान उससे प्यार हो जाता है बातें करना हँसी मजाक करना प्यार होता है।
  15. मुझे प्यार का एहसास कब हुआ यह मैं आपको बता सकता हु यह एहसास मुझे उसके साथ रहने से नहीं बिछड़ने से हुआ  तब मुझे उसकी छोटी बड़ी हर प्रकार की बातें याद आने लगी तब मै समझ नहीं पा रहा था की क्यों बातें याद आने लगी अब मन करने लगा की मैं उससे बहुत सारी बातें करूँ और वह मेरे सामने रहे और समय वही पर रुक जाये मै उसे देखता रहू पर इन बातों और यादों की वजह से मुझे प्यार का गहरा एहसास और बेचैनी होने लगी। मैं कब उससे मिलूँगा और उससे क्या कहुगा ऐसा मन हो रहा की मै उससे मिलू और मिलकर सब उससे बता दू 
  16. मैंने बहुत इंतजार किया और पढ़ाई जारी रखी लेकिन पढाई में मेरा बहुत मन नहीं लगता था लेकिन मै कोई काम भी करता था तो मन नहीं लगता था उस समय ऐसा लगता था मै उससे बहुत नफरत करूँ क्योकि मुझे ऐसा प्रतीत होता था की मैं बहुत ही मुसीबत में आ गया हु की मेरा मन ही नहीं लगता है किसी काम को करने में  तो अब मै क्या करू सबकुछ बेकार लगने लगा और कुछ भी समझ नहीं आ रहा था  उस समय न ही मरने का मन कर रहा था और न ही जीने का अब मै बहुत ही दुविधा में आ गया।और मैंने यह बात किसी को नहीं बताई और दिन गुजरते चले गए  यदि मैं किताब देखु तो उसका चेहरा नजर आये  इस प्रकार से दिन गुजरते चले गए exam ख़त्म हो गए गर्मियो को holiday आ गयी  अब तो उसकी याद और आने लगी और फिर से जीवन अच्छा नहीं लग रहा था। और एक दिन अचानक वह मेरे सामने आ गयी तो मुझे क्या एहसास हुआ यह केवल मैं ही जान सकता हु लेकिन जब वह मेरे सामने आ गयी तो मुझे उससे बात करने की इच्छा हुई पर मै उससे कुछ कह नहीं पा रहा था उस समय मुझे ऐसा लग रहा था की क्या वह भी मुझसे ऐसे ही प्यार करती है की फिलहाल मै अपनी बहुत सारी बातों को अपने दिल में रखा रहूँ यह मेरे लिए अच्छा है यह मैंने समझा। तब मैंने उससे इस विसय में कोई भी नहीं की। उससे मिलने के बाद मुझे यह एहसास हुआ की काश मै अपने दिल की बात कह देता लेकिन मैंने समझा की क्या वह मेरी बात को किस तरीके से समझेगी  इसलिए मैंने उससे कोई बात नहीं की। मुझे शक ही रहा था की वह भी मुझसे प्यार करती है । पर शायद मेरी तरह मुझसे कह नहीं पा रही थी  लेकिन मैं आजतक नहीं जान पाया हु की वह मुझसे प्यार करती है या नहीं। लेकिन यह जरूर जान गया हु की मै उससे प्यार करता हूँ। 
मेरे अनुसार वह कैसी दिखती है  वह कैसी है  तो मैं बस यह कहुगा की वह दिल की तो बहुत अच्छी है  पर वह बोलती बहुत है शायद मुझे यही बात बहुत अच्छी लगी । ऐसा लगता है वह संसार में सबसे सुन्दर है  और यह बात मैंने सुनी और किताबो में पढ़ी है  है की कोई प्रेम करने वाला अपनी प्रेमिका को सबसे यही कहता है वह मुझे बहुत अच्छी लगती है और ऐसा लगता है की उससे अच्छा कोई नहीं है। 

Thursday, 28 September 2017

प्यार की पहचान-2


  • प्यार एक अलग संसार है जिसमे डूब जाने का मन करता है। 
  • प्यार करने वाले के लिए यह संसार बहुत अच्छा और प्यारा लगता है।
  • प्यार हो जाने से कोई भी चीज पाने की इच्छा नहीं रहती है।
  • प्यार को कोई सामान्य प्राणी नहीं समझ सकता है।
  • प्यार को पाने के लिए मेहनत परिश्रम की आवश्कता नहीं होती है प्यार तो स्वयं हो जाता है।
  • किसी को इस बात का पता नहीं हो पाता की प्यार कब कैसे क्यों और किससे हो जाता है।
  • प्यार का एहसास मिलने से नहीं बिछड़ने से होता है। 
  • प्यार वह एहसास जो न ही मीठा और न ही कडुवा होता है। इस एहसास को शब्दों में नहीं कहा जा सकता है।  इस एहसास में यह नहीं कहा जा सकता है की प्यार सुख है या दुःख है।  प्यार कने वालो के लिए सुख और दुःख एक समान प्रतीत होते है। इस एहसास में न तो जीने का मन करता है और न ही मरने का मन करता है। 
  • प्यार के एहसास में ईस्वर की वास्तविकता का ज्ञान होता है। 
  • मेरे अनुसार-प्यार ही जीवन है पर इस संसार में प्यार का अपमान सदियो से होता चला आ रहा है । इस संसार में सच्चा प्यार करने वालो को न कोई समझ पाया है और न कोई समझ पायेगा। 
  • मेरे अनुसार प्यार को कभी भी पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए यदि ईस्वर पर विश्वास है तो प्यार स्वयं मिल जाता है। 
  • मेरे अनुसार प्यार की तड़प केवल प्यार करने वालो को ही मालूम होती है। 
  • मेरे अ

Wednesday, 27 September 2017

प्यार की पहचान

वो लम्हे ये दूरी तेरे बिन सही न जाये,तेरी याद में ये जीवन भी रास न आये,न ही भूख लगे और न ही नींद आये ,बस एक तू ही तो है जिससे मेरी जिंदगी गुजर जाये । जीवन तो एक संघर्ष है प्यार बिना जिया भी न जाये । आज मैं भ्रमित हु की प्यार हो तो अच्छा न हो तो अच्छा कुछ भी मेरी समझ में न आये। दिल भी क्या चीज है कुछ शब्दों में कहा भी न जाये प्यार के कितने रूप यह समझ में न आये । दिल की बातो को मुख से कहा भी न जाये किस तरह प्यार का इजहार करू कुछ भी समझ में न आये। मेरे दिल में क्या है कुछ भी जुबा पर ना आये दिल में एक बैचैनी होती है
 किस तरह कहू की समझ न आये । प्यार वास्तव में क्या चीज है कुछ भी समझ में न आये। थोडा थोडा समझ रहा हु फिर भी समझ न पाऊ हर दिन हर पल तेरी याद आती है कैसे यह बता पाऊ। यह जीवन भी अब अच्छा न लगे कैसे मै तुझे समझा पाऊ।प्यार में जीवन न जिया जाये  न ही  मरा जाये कुछ भी समझ में न आये। प्यार एक ऐसा एहसास है जिसमे खट्टा मीठा कडुआ भी एहसास हो जाये  जिसने प्यार नहीं किया वह इसको कभी समझ न पाये ।
याद कितनी आये जुबा से कुछ भी कहा न जाये दिल क्या चीज है कुछ भी समझ न आये। प्यार के विष्ाय में कुछ कहा जाए बहुत कम है प्यार एक मीठा एहसास है  जो धीरे धीरे सताता है  प्यार में भूख तो लगती है पर खाने का मन नहीं करता है जिस तरह आँखों में नींद आती है पर आंखे बंद करने का मन नहीं करता है  प्यार में पागल हो जाने को जी चाहता है पर पागल होने से डर लगता है जी चाहता है प्यार में पूरी तरह डूब जाऊ पर डूबने से डर लगता है  प्यार को किस तरह परिभाषित करू  कुछ भी समझ न आये।

Monday, 18 September 2017

विचारो की शक्ति और ज्ञानदीप


  • विचारों से ही कर्म करने की प्रेरणा मिलती है और कर्म से विचार पनपते है। शुभ और दिव्य विचार विधाता के विशिष्ट वरदान है । सच कहा जाये तो विचार व्यक्ति की आत्मा है । आत्मा एक शरीर तक सीमित नहीं है इसलिए विचार भी अपने में सबको और सभी में अपने को समेटे हुए है । विचार शुद्ध है । विचार हताशा की दवा है सुविचार वरदान स्वरुप होते है । विचार के साथ जब विश्वास का समायोजन होता है तब मानो ह्रदय और आत्मा का समायोजन होता है । सदविचार और विश्वास से सब कुछ संभव है । विश्वास से विश्व है विश्वास से ही ब्रम्हाण्ड है । इससे ही सागर बून्द बन जाती है । अंश पूर्ण हो जाता है और अकेलेपन का अन्त हो जाता है । विचार सजीव और सूक्षम होते है  कर्म इनकी देन है । विचार अपरिजेय जीवनी शक्ति है । हमे अपने प्रति ईमानदार होना होगा ताकि मेहनत पर विश्वास हो । आवश्यक नहीं की किये हुए काम पर सफलता मिलने पर ही खुशी मनाई जाये । असफलता पर भी निराश नहीं होना है । उसे हटाने के लिए संकल्पबद्ध होना होगा। अपनी हिम्मत और लगन के प्रति आस्था पैदा करनी होगी। विचारो में बड़ा जादू है यह हमे गिरा भी सकते है और उठा भी सकते है । आत्म विश्वास को मजबूत करते हुए है मानव का target होना चाहिए  ।

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए मनुष्य को कार्य को पूर्ण आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए।
ज्ञानदीप-भीतर के ज्ञानदीप को जलाकर मीरा ने सत्य का दीदार किया था 

  • सकारात्मक सोच भीतर के ज्ञानदीप को जलाकर मन में वासना की काली बदली को दूर करो। जैसे सुर्यास्त कभी नहीं होता वैसे ज्ञानदीप कभी नहीं बुझता इसलिए अपना दीपक स्वयं बनो और भव बंधन से मुक्त हो जाओ। अज्ञान का पर्दा उठाइये ,ज्ञान का सूर्य चमकने लगेगा।

Friday, 8 September 2017

कर्मक्षेत्र और मोक्ष

विधि के विधान के अनुसार जीव को कर्म भोग के लिए संसार में आना पड़ता है और यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कर्मक्षेत्र में किये कर्मो के फल से मुक्त नहीं हो जाता है । जीव का शरीर पांच महान विभूतियो से बना है-पृथ्वी, जल,अग्नि,वायु और आकाश द्वारा होता है। इस आवरण में अहंकार , बुद्धि, और प्रकृति के तीनो गुणो-सतो, रजो, और तमो का समावेश होने के कारण इन गुणो की अवस्था उसके व्यक्त्तिव का निर्माण करती है।हर शरीर में यह तीनो गुण अलग अलग अनुपात में विद्यमान रहते है। इसके साथ शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रिया-नाक,कान,नेत्र,जीभ और त्वचा होती है। जिनके द्वारा वह संसार का अनुभव करता है। और मन इन ज्ञानेन्द्रियों का स्वामी है वह इन इन्द्रियों से प्राप्त सुचना के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया हाथ पैर जीभ आदि से देता हुआ अलग अलग प्रकार के कर्म करता है कभी इस प्रकार के कर्म करता है जिनका फल उसे भविष्य में भोगना पड़ता है  इस प्रकार जीव के कर्मक्षेत्र का निर्माण प्रक्रति के 24 तत्वों द्वारा होता है।
जीव का संसार में जन्म लेने का परम उद्देश्य केवल कर्मफल से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना है, परंतु वह अक्सर इन्द्रियों के वशीभूत होकर पुनः तरह तरह दुःख भोगता है इसलिए जीव के कर्मो को मोक्षदायी बनाते हुए विनाम्रता ,अहिंसा, सरलता जैसे गुण अपनाते हुए गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए  जो उसे पवित्रता, आत्मसंयम और इंद्रितृप्ति के विषयो से दूर होकर उसके अंदर वैराग्य की भावना जाग्रत करेगा। मनुष्य योनि को इसलिए उच्च कोटि का माना गया है, क्योकि सब प्राणियो में केवल मनुष्य को ही विवेक की शक्ति प्राप्त है। इसलिए मनुष्य को कर्मक्षेत्र में विवेक का उपयोग करते हुए और उचित कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करना  चाहिए।
आत्मा का स्वरुप ही आनंद का बोध  कराता है । जिस मनुष्य को आत्मबोध हो जाता है , वह सदैव प्रसन्न रहता है  जो प्रसन्न नहीं रहता है वह आत्मा को नहीं समझता है और न ईश्वर को ।शोक ग्रस्त मनुष्य  की आस्तिकता संदिग्ध होती है  मनुष्य को आत्मबोध करना आवश्यक है उसे कठिनाइयों से घबराना नहीं प्रेम करना चाहिए । कठिनाईयो की शिक्षा से ही मनुष्य का बुद्धि कौशल विकास होकर ज्ञान विज्ञान की इस सीमा तक पंहुचा है ,यदि मानव जीवन में आपत्तियां , कठिनाइयां न हो तो मनाव जीवन निनांत निष्क्रिय और निरुतशाह पूर्ण बन जायेगा  इसलिए प्रसन्नता से जीवन को सुखमय बनाना चाहिए । यह भौतिक संसार सर्वत्र प्रसन्नता के लिए ही उपजाया गया है  जो बुरा व् असुभ है वह हमारी प्रखरता के लिए एक चुनौती है । exam में प्रश्न पत्र देखकर student अगर रोने लगे तो उसे अध्ध्य्यन मननशील नहीं माना जा सकता है।
जिस मनुष्य जरा सी कठिनाईया या प्रतिकूलता पर विलाप शुरू कर दिया  उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास करेगा? प्रतिकूलता हमारे साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और शक्ति को बढ़ाने आती है । यदि जीवन भली प्रकार संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे तरीके का होगा । ऐसा इसलिए क्योकि वह सफलता पूर्वक गुजर रहा होगा उसमे न तो किसी तरह की विशेषता रह जाती है और न कोई प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला नहीं । क्या विश्व में किसी का ऐसा जीवन संभव हो सका है  इसलिए संकटो को जीवन विकास का एक अनिवार्य उपाय मानकर मनुष्य को उनका स्वागत करना चाहिए उनको चुनौती स्वीकार करना चाहिए और एक आपत्ति को दस कष्ट सहकर भी दूर करते रहना चाहिए । यही पुरुषार्थ और मनुष्यता है ।

Wednesday, 6 September 2017

जीवन महोत्सव

विश्व महामंच के जीवन महोत्सव में हम सभी जीव , पात्रो की भूमिका में है। हमारे अभिनय की सफलता हमारी भूमिका में निहित है। हमारी भूमिका हमारी मानसिकता से संबद्ध है । मानसिकता जितनी उन्नत होगी , अभिनय उतना ही अच्छा होगा। इसलिए जीवन को महोत्सव बनाने के लिए विचारों को सदैव उच्च और सुदृढ़ रखना होता है। मन को न केवल नियंत्रित बल्कि ऊर्ध्व गामी संचेतना से भरपूर रखना पड़ता है। एक और  महत्वपूर्ण बात यह है की भ्रम वश हम स्वयं को ही सूत्रधार  भी मान बैठते है। जबकि सूत्रधार परमात्मा है । उनके संकेतो पर चलने के लिए ही हम बाध्य है। इसलिए परमात्मा की क्षत्र छाया तो एक प्रकार से हमारा संबल है। 

  • ज्ञान और भक्ति को आत्मसात कर जीवन को सार्थक किया जा सकता है मनुष्यत्व ही मूल है यही कारण है की सभी धर्मो में कहा गया है की मनुष्य बनो। मनुष्य बनने के लिए हमे सच्चाई से जुड़ना होगा और अपनी शक्ति को पहचानना होगा। नर ही नारायण है, यह महसूस करना होगा । अपना मनोबल बढ़ाने के लिए संयम धारण करना होगा। जप, तप, ध्यान , भक्ति प्राय: एक रूप है। इनके अध्य्यन से अपनी शक्ति को बढ़ाना होगा । जीवन की वास्तविकता का बोध ही हमारा target है। विवेक के माध्य्म से दिव्य शक्ति का अनुभव किया जा सकता है। चारो पुरुषार्थों का जीवन में सुंदर सामंजस्य हो। नैतिक मूल्यों की धारणा ही धर्म है। नैतिक व्यक्ति ही धार्मिक होता है। दया,करुणा के भाव उसके जीवन को अधिक उपयोगी बना देते है। वह लोकहित को ध्यान में रखकर ही कार्य करता है । अर्थोपार्जन ,दूसरा पुरुषार्थ है। यह अर्थोपार्जन भी न्यायसंगत होना चाहिए । जो लोग अनीति से धन कमाते है। अंततः उनका विनाश होता है। दांपत्य काम, पुरुषार्थ का रूप है । संयमित प्रेममय जीवन सुख और शांति का पथ प्रशस्त करता है। फलतः व्यक्ति परम पुरुषार्थ यानि मुक्ति मार्ग का अनुयायी बन जाता हैं।

Tuesday, 5 September 2017

इच्छाएं

मनुष्य जीवन भर इच्छाओं , कामनाओं के पीछे भागता रहता है। जीवन कुछ इच्छाओं की पूर्ति तो हो जाती है, पर ज्यादातर इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती है । मनुष्य द्वारा की गई इच्छाओं की जब पूर्ति हो जाती है तो वह फुले नहीं समाता । वह अहंकार युक्त हो जाता है । उस कार्य की पूर्ति का सारा श्रेय स्वयं को दे देता है । जब इच्छा की पूर्ति नहीं हो पाती है तब मनुष्य ईश्वर को दोष देने लगता है,अपने भाग्य को दोष देने लगता है। मनुष्य की इच्छाएं अनंत होती है।वे धारा प्रवाह रूप से एक के बाद एक कर आती चली जाती है। एक इच्छा की पूर्ति के बाद दूसरी इच्छा फिर मन में उठने लगती है । जीवन पर्यन्त यही क्रम चलता रहता है । वर्तमान के इस भौतिक युग में लोग इच्छाओं से भी बड़ी महत्वाकांक्षी होने लगते है। ऐसी ऐसी इच्छाएं संजोते है  जिनके बारे में स्वयं जानते है की वे शायद ही कभी पूरी हो पाये । इस संसार सुख की प्राप्ति के लिए मनुष्य सदा प्रयत्नशील रहता है । इसके लिए वह सदैव कामना करता रहता है। वह नहीं जानता है की सुख स्वरुप तो वह स्वयं ही है । गुणो के आधीन यह सांसारिक सुख तो क्षणभंगुर है। यह समाप्त होने वाला है तब फिर इन सांसारिक सुख की इच्छाओं के पीछे क्यों भागा जाये? 

मन में उठने वाली कामना यदि पूरी हो जाती है तो राग उत्पन्न हो जाता है और इसकी पूर्ति न होने पर मन में क्रोध जन्म ले लेता है । दोनों ही स्थिति मनुष्य की हानि है। संपूर्ण इच्छाओ की पूर्ति कभीं नहीं हो पाती है ,जबकि इन इच्छाओं की पूर्ति करने में मनुष्य अपना सारा श्रम लग देता है । मनुष्य को चाहिए की इन इच्छाओं का दामन छोड़कर अपने नियमित कार्यो में लग जाना चाहिए तभी वह सुख और शांति प्राप्त कर पायेगा फिर वह कामनाओं के जाल में नहीं फसेंगा । इच्छाओ के संदर्भ में मनुष्य को एक बात याद रखनी चाहिए की मानव सिमित है और इच्छाये असीमित है।सीमित कभी असीमित की पूर्ति नहीं कर सकता।

Sunday, 3 September 2017

स्वयं को बदले

आज हममे में अधिकतर लोगो की स्थिति उस दार्शनिक की तरह है जिसने स्वयं को अपने बिस्तर पर देखा और अपने को वहां नहीं पाया । ऐसा इसलिए, क्योकि बिस्तर ख़ाली था । कुछ देर बाद ही वह घर के बाहर आकर चिल्ला चिल्ला कर पूछने लगा, कृपया कोई मुझे बता दे की मै कहाँ हूँ, अब मै स्वयं को कहाँ खोजू । मैंने सोचा मैं बिस्तर पर हूँ पर मै वहां भी नहीं हूँ। बेशक यह एक अजीबो गरीब कहानी है, लेकिन हर मनुष्य की कहानी है । आप अपना फ़ोन नंबर , सेल नंबर , बैंक अकाउंट नंबर आदि भी अच्छी तरह से जानते है। आप अपनी पत्नी, पति,बच्चों आदि को भी जानते है । आप यह भी जानते है की कौन आपका बेटा है और कौन बेटी,पर क्या यह जानते है की आप कौन है, और कहाँ पर है? यह सवाल जिंदगी भर अधूरा रह जाता है, क्योकि आप लोग इसे छूना नहीं चाहते हैं और यू ही चले जाते है। इसलिए आपको बदलना होगा। 

यह तभी सम्भव है जब हर आदमी अपनी खोज में निकल जाये। यदि आप इसे नहीं छोड़ पायेगे तो स्वयं को संभाल ले , ईश्वर को अपने कार्य मार्ग में जाने दे और आप अपने कार्य में लग जाये। अब आप अपने बारे में सोचे और अपने आसपास के लोगों में देखे। यह आपका छोटा सा संसार है जो बड़ा बन जाता है। आप सब धार्मिक है हो सकता है कुछ लोग धार्मिक नहीं भी हो लेकिन आप सबकी अपनी अपनी दिन चर्याये है । जो धार्मिक है वे विभिन्न विचारधाराओ में बटे हुए है। इनमे से अनेक लोग जीवन को नहीं समझते ,धर्म को नहीं जानते बल्कि जो सिखाया गया है उसी में अपना जीवन काट रहे है। इन्हे लगता है जो कर रहे है वही उनका सत्य है।  जो मान रहे है वही उनका भगवान् है उनसे अलग जो दुनिया है वह अच्छे लोगों की दुनिया नहीं है  इसलिए वे ही अच्छे है सच तो यह है की ईश्वर की अनुभुति के लिए हमे कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर  ध्यानयोग की गहराइयो में उतारना होगा।

Sunday, 27 August 2017

गुणों की शक्ति

कल्पना करे की यदि गुलाब का फूल सुगंधहीन हो जाये तो कौन उसे पाना चाहेंगे । इसके आगे कल्पना करे की फूल में सुगंध है , किन्तु प्रकट नहीं हो रही है तो उसका कितना महत्व रह जायेगा। गुलाब का रंग और रूप उसकी सुगंध से मूल्यवान हो जाता है। गुलाब का रंग और रूप ऐसा न हो फिर भी यदि सुगंध है तो उस पर मोहित होने वालो की संख्या कम नही होगी। आम का फल कैसे भी आकार का हो , अपने स्वाद के कारण मन को भाता है। सुगंध गुलाब का और स्वाद आम का गुण है। मनुष्य की जुबान से निकलने वाले मीठे वचन, हाथो से होने वाले परोपकार , मन और मस्तिष्क में उपजने वाले शुभ विचार ही उसके मोल है । कितने भी महंगे वस्त्र पहने हो, भव्य आवास और धन दौलत हो , स्वस्थ सुंदर  तन हो उनसे पहचान तो बन सकती है लेकिन सम्मान नहीं मिल सकता है। संसार में शुभ वचनो की कमी नहीं। सिद्धान्तों नीतियों के ग्रन्थ भरे पड़े है। वचन मुख तक ही सीमित हो गए, किताबों से बाहर का रास्ता भूल चुके है। इसलिए उन व्याख्यानों का कोई मोल नहीं रह गया है। ऐसे मनुष्य अपना सम्मान खो चुके है। 

सारे लोग अपने गुणों के कारण महापुरुष की श्रेणी में नहीं आ सकते है, किन्तु सारे लोग यदि अपने छोटे छोटे गुणों को भी व्यवहार में बदले तो गुणों से भरपूर समाज की रचना की जा सकती है । भिन्न भिन्न फलो के सारे वृक्ष आकर्षित करते है और विभिन्न स्वादों का आनंद देते है । गुण किसी भी प्रकार के हो , मन को अपनी ओर खीचने वाले होते है। इसी तरह  गुणवान समाज की रचना में छोटे से भी छोटे योगदान का भी महत्त्व है। समाज मात्र शब्दों की शोभा से  नहीं बनते । मनुष्य अपने कर्मो की चिंता करे , अपने गुण विकसित कर प्रकट करे। सारा समाज अपने आप बदल जायेगा। विडंबना यह है मनुष्य के पास इसके लिए समय नहीं है। उसे चिंता है तो दुसरो की । वह अनायास ही अन्यो की सफलता पर ईर्ष्यालु रहता है। सभी में दोष तलासने में उसकी ख़राब आदत संतुष्ट होती है । वह औरो से प्रतिस्पर्धा भी नहीं करना चाहता ,बस उनकी प्रगति को अवरुद्ध करने में लगा रहता है। 

Friday, 25 August 2017

संयम है समाधान

हर व्यक्ति समस्याग्रस्त है। कुछ समस्याऐ बाहर की है और कुछ भीतर की। समाधान सभी चाहते है। यह शरीर एक नौका है। ये डूबने भी लगता है और तैरने भी लगता है,क्योकि हमारे कर्म सभी तरह के होने से यह स्थिति बनती है।इसलिए बार बार अच्छे कर्म करने की प्रेरणा दी जाती है।हमे यह समझ लेना चाहिए की जिस प्रकार एक डाल पर बैठा व्यक्ति उसी डाल की काटता है तो उसका नीचे गिर जाना अवश्य भावी है, उसी प्रकार गलत काम करने वाला व्यक्ति गलत फल पाता है।

मेरा दृढ़ विश्वास है की आज जो बड़े कहलाने वाले लोग उनकी जीवन शैली संयम प्रधान हो जाये तो हिन्दुस्तान का कायाकल्प हो सकता है। सामाजिक परिवर्तन का एक अच्छा रास्ता यह है की बड़े कहे जाने वाले लोग अपनी जीवन शैली को संयम प्रधान बनाये। बड़े लोगो में बड़े व्यापारी उद्योगपति , सांसद, विधायक, मंत्री और सामाजिक नेता यह सभी आ जाते है।अगर इन लोगो के जीवन में संयम आ जाये तो नीचे तबके के लोग स्वयं प्रेरित होंगे। जिनके पास जरुरत भर के 

Thursday, 24 August 2017

अमृत सन्देश

हमारा देश धर्मप्रधान होने के कारण ही एक महान देश कहलाता है। यह वही भारतभूमि है, जहाँ से धर्म और दार्शनिक तत्व समूह ने बरसाती नदी के समान प्रवाहित होकर सारे संसार को सराबोर कर दिया था। संसार में अनेक प्रकार के प्रतिद्वंद्वी समूह रहेगे ही, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की एक दूसरे से घृणा की जाए या विरोध किया जाये । प्रत्येक आत्मा में परमात्मा को देखने वाले महापुरुष ही धर्मस्वरूप को समझते है और वे ही अहिंसा की आराधना कर सकते है। अहिंसा एक सनातन तत्व है। अहिंसा , संयम , तप रूप मंगलमय धर्मदीप का प्रकाश यदि world को आलोकित कर दे , तो निश्चय ही धरा से अज्ञान का तमस समाप्त हो सकता है। दुसरो को का अस्तित्व मिटाकर अपना अस्तित्व बनाये रखने की कोशिश अंततः घातक होती है । अहिंसा भारतीय संस्कृति की मुख्य पहचान है। अहिंसा सभी को अभय प्रदान करती है। आज का सभ्य संसार वातावरण में घुटन और अस्वस्थ होने का उदाहरण दे रहा है। आज शांति के लिए एक आध्यत्मिक जागृति आवश्यक है, जो राष्ट्र ,समाज , और परिवार से हिंसा का अन्धकार दूर कर सके। मानव जाति को सुदृढ़ और सुगठित रखने का दिव्य सन्देश है। अहिंसा का अर्थ है किसी की हत्या न करना,खून न बहाना, मन ,वचन कर्म से किसी को कोई दुःख न देना अहिंसा है। अहिंसा के अंतर्गत केवल मानव ही नहीं पशु पंछी , जीव जंतु को भी दुःख पहुचाना नहीं   चाहिए।  अर्थात् अपनी आत्मा के सामान ही सबको मानो। अहिंसा का सम्बन्ध मनुष्य के ह्रदय के साथ है,मस्तिष्क के साथ नहीं। जिसके जीवन में अहिंसा का स्वर झंकृत होता है, वह केवल शत्रु को ही प्यार नहीं करता बल्कि उसका कोई शत्रु ही नहीं है। जिसको आत्मा के अस्तित्व में विश्वास है, वही हिंसा का त्यागी हो सकता है। कुछ लोग अहि

Wednesday, 23 August 2017

उदास न हो

जीवन में प्राय: ऐसे पल आते रहते है जब मन उचाट और उदास होने लगता है। एक भय पैदा होने लगता है की कही कुछ गलत तो नहीं होने जा रहा है। बिना किसी कारण मन का उदास होना मन की हताशा और आत्म विश्वास की कमी को प्रकट करता है। जब प्रत्यक्ष कारण हो तो भी यह खंडित विश्वास और नकारात्मक मानसिकता का प्रतीक है। मनुष्य का विश्वास तभी डोलता है और मन तभी निराश होता है जब वह ईश्वर पर अविश्वास कर रहा होता है। चौरासी लाख योनियो में भटकने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त करने के बाद भी यदि मन में ईश्वर के प्रति विश्वास और आभार का भरपूर भाव नहीं है तो इसे उसकी अज्ञानता ही कहा जायेगा । मनुष्य योनि में होना ही विश्वास और आशा का सबसे बड़ा आधार है जो कभी उसके मन को डिगने नहीं देता है। यदि उसे मनुष्य योनि मिली है तो यह सबसे बड़ा कारण है प्रसन्न और आशा से भरे रहने का की उसे आवागमन के चक्र से मुक्त करने और संसार के मायाजाल से उबरने योग्य समझा गया है। उसे मनुष्य के रूप में जो समय मिला है वह हताशा और निराशा में व्यर्थ जाने देने के लिए नहीं है । इसका सदुपयोग करना आना चाहिए । दूसरी बात भय और चिंता की है जो परमात्मा को न समझने के कारण है। 

संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे अनहोनी कहा जा सके। जो हो रहा है या भविष्य में होने वाला है उसे रोका नहीं जा सकता है। ऐसा इसलिए , क्योकि इसमें ईश्वर की इच्छा है। जिसके हम पात्र है, वही हमे दे रहा है । इसलिए किसी तरह की चिंता और आशंका बेकार है। किसी भी आशंका से दूर जब ईश्वर के न्याय पर विश्वास करना आ जाता है तो मन प्रसन्नता से भर उठता है। ईश्वर की दया का इसी से पता लगता है  की उसने सृष्टी में जितनी भी रचनाये रची है उन सभी में कुछ न कुछ गुण दिए है। संसार में कुछ भी गुणविहीन नहीं है । भले ही राह की धूल या रोडा ही क्यों न हो। हर चीज का कोई न कोई उपयोग है । सर्वाधिक गुण मनुष्य में है। जब उसे आभास हो जाये की वह कितनी अदभुत शक्तियों का स्वामी है  तो वह ऐसे गर्व की अनुभूति से भर उठेगा की निराशा सदा के लिए उसके जीवन से पलायन कर जायेगी । ईश्वर के न्याय के प्रति  विश्वास होना ही जीवन में हर्ष भाव का मुख्य उतपर

Sunday, 20 August 2017

आनंद की खोज

आंतरिक आनंद एक ऐसा एहसास है जिसका हममे से ज्यादातर लोगो को एहसास नहीं होता । इसका कारण है की हम बाहरी चीजो में बसे हुए है। हम आनंद प्रदान करने वाली चीजो को आकार में पहचानते है, जबकि आनंद का अस्तित्व अनाकार में है। सौंदर्य को महसूस करने की क्षमता, अपने आप में मगन रहने की आदत , साधारण वस्तुओ की तारीफ़ करना, लोगो से स्नेह रखना और उन्हें प्यार करना , उनसे सम्बन्ध बनाना , इन पीछे जो चीज है, वह है संतोष का एहसास, यह एहसास अनाकार ही तो है और इसलिए अदृश्य है। संतो, दार्शनिको और कवियों पर नजर डाले तो यह पता चलता है की वे जीवन भर सच्ची ख़ुशी की तलाश में रहते है। वे महसूस करते है की जिसे वे खोज रहे थे वे दिखने में असाधारण , लेकिन नगण्य लगने वाली वस्तुए है। ऐसी जिसे हम जीवनभर आसपास देखते रहते है। यह और बात है की उसे महसूस नहीं कर पाते। ख़ुशी के लिए छोटी चीज काफी है। बस इसे पाने के लिए शांत रहना सीखिये। 

दरअसल छोटी छोटी चीजे हमारे अंतर्मन को विस्तार देती है। छोटी खुशियो के लिए जिस आत्मसजगता की जरुरत होती है। उसके लिए अंदर से शांत होना अनिवार्य है। सजग रहने से आंतरिक ख़ुशी के दरवाजे खुलते है। मन जितना शांत होता है उतना ही आनंद महसूस होता है। आप समर्पित होकर कर्म में जुटे रहे तो हर चीज की जीवन्तता को अपने एहसास में पायेगे। तब आप खुद को उस आनंद का हिस्सा पायेगे जो सृष्टी और प्रकृति के कण कण में विद्यमान है। एक बात समझने योग्य है की सुख और आनंद में अंतर है। सुख भौतिक वस्तुओ से सम्बन्धित है और आनंद ऐसी मन की दिशा है जिसमे भौतिक वस्तुओं के अभाव में व्यक्ति अंतर्मन में प्रसन्नता महसूस करता है।

Friday, 18 August 2017

किसके लिए जिए

यह बड़ा प्रश्न है की किसके लिए जिए।सभी की भिन्न भिन्न प्राथमिकताएं होती है। उन्हें प्राप्त करने का ढंग भी अलग अलग होता है। मनुष्य अपने बारे में सबसे पहले सोचता है, उसके बाद परिवार के प्रति। ऐसे भी लोग है जो परिवार के मोह में अपने हित भी उपेक्षा में कर देते है। जितना अधिक उदार मनुष्य का मन होता है उतने ही लोग उसकी चिंता के दायरे में सिमट जाते है। थोड़े से लोग ऐसे भी हुए, जिन्होंने किसी भेदभाव के बगैर पुरे समाज की चिंता की। वे आज महापुरुष के रूप में पूजनीय है। अपने और अपनों के हितों से ऊपर उठकर व्यापक द्रष्टी धारण कर पाना दुष्कर कार्य है।इसके लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है। मनुष्य वास्तव में एक अत्यंत निरीह प्राणी है। इसे पांच शक्तिशाली योद्धाओ ने घेर रखा है। यह योद्धा है-काम , क्रोध,मोह, लोभ और अहंकार। मनुष्य का इनसे बड़ा शत्रु और कोई नहीं। यह इतने प्रबल है की मनुष्य की इन्द्रियों को जीतकर अपने वश में कर लेते है। जब इन्द्रियों पर इन शत्रु योद्धाओ का आधिपत्य हो जाता है तब मनुष्य के मूल उद्देश्य को खो देता है।  विवेक, बुद्धि,संयम ,संतोष, दया और परोपकार जैसे गुण पराजित हो जाते है, जितना शक्तिशाली इनका प्रभाव होता है, मनुष्य उतना ही निर्बल हो जाता है। 

  1. कई बार मनुष्य अपनों के हितों को दांव पर लगा देता है। अपने ही परिवार का शत्रु बन जाता है। ज्ञान, धर्म, नैतिकता मूल्य आदि इसके लिए अर्थहीन हो जाते है। ऐसे लोगो के सामने धर्म,समाज की जितनी भी बातें की जाये वे बेकार हो जाती है। समाज में बदलाव की बातें निरंतर होती रहती है। इसके बावजूद समाज में गिरावट रुक नहीं रही। इसका कारण यही है की बातें पत्थरों से की जा रही है। पांच विकारों ने मनुष्य की दसो इन्द्रियों को जीतकर उसे पत्थर जैसा संवेदनहीन बना दिया है। ये पांच योद्धा समाज में व्याप्त वातावरण के कारण शक्तिशाली हो गए है और मनुष्य की इन्द्रियों को जीतने में सफल रहे है। समाज में कैसे स्त्रियों और पुरुषों की नैतिकता का पतन हो रहा है। समाज से उन तत्वों को हटाना पड़ेगा जिनसे काम, क्रोध,लोभ ,मोह,और अहंकार को ताकत मिलती है। यह मनुष्य के जीवन का उद्देश्य हो की उसे विकारों का गुलाम बनकर नहीं रहना है। उसका संकल्प हो की उसकी इंद्रिया मुक्त रहकर उसके जीवन की सहायक बने।

Monday, 14 August 2017

चरित्र

जीवन यानी संघर्ष यानी ताकत यानी मनोबल। मनोबल से ही व्यक्ति स्वयं को बनाये रख सकता है, अन्यथा करोडो की भीड़ में अलग पहचान नहीं बन सकती। सभी अपनी अपनी पहचान के लिए दौड़ रहे है, चिल्ला रहे है। कोई पैसे से , कोई अपनी सुंदरता से , कोई विद्वता से ,कोई व्यवहार से अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए प्रयास कर रहा है , पर हम कितना भ्रम पालते है। पहचान चरित्र के बगैर नहीं बनती है। बाकी सब अस्थायी है। यह सही है की शक्ति और सौंदर्य का योग ही हमारा व्यक्तित्व है, पर शक्ति और सौंदर्य आंतरिक भी होते है और बाहरी भी होते है। धर्म का काम है आंतरिक व्यक्तित्व का विकास। इसके लिए मस्तिष्क और ह्रदय को सुंदर बनाना होता है। जो सदविचार और सदाचार के विकास से ही संभव है। उत्कृष्ट चिंतन से जीवन जीने का सलीका आता है। इससे अंतर्मन में संतोष और बाहर सम्मान पूर्ण वातावरण का सृजन होता है। ऐसे चरित्र और नैतिकता सम्पन्न व्यक्तियों के सामने इंद्र और कुबेर का वैभव भी समर्पित हो जाता है। चरित्र एक साधना है तपास्या है। जिस प्रकार अहंकार और अहम का पेट बड़ा होता है उसे रोज कुछ न कुछ चाहिए। उसी प्रकार चरित्र को रोज संरक्षण चाहिए और यह सब दृढ़ मनोबल से ही प्राप्त किया जा सकता है। समाज में संयमित व्यक्ति ही सम्माननीय है और वही स्वीकार्य भी। संयम ही जीवन है। अहिंसा की प्रतिष्ठा के लिए संयम प्रधान जीवनशैली का विकास जरुरी है। आशक्ति पर विजय प्राप्त किये बिना संयम का विकास नहीं हो सकता है। मानसिक और सामाजिक शांति व् सुव्यवस्था के लिए अनाशक्ति से जीवन में स्वार्थ की भावना उत्पन्न हो जाती है । अंहकार का भाव बढ़ जाता है। मनाव मन को उससे मुक्ति दिलाने के लिए आद्यात्म का आश्रय चाहिए। यह संतुलन की प्रक्रिया है। सच तो यह है की चरित्र निर्माण से ही जहाँ आपके व्यक्त्तिव का निर्माण होता है,वहीँ अच्छे चरित्र वाले लोगो से ही देश का निर्माण होता हैं।

Sunday, 13 August 2017

अहिंसा

अहिंसा का अर्थ हम प्राय: हिंसा के विलोम शब्द के रूप में लेते है, जिसका अर्थ जीव हत्या न करना और मांसाहार से दूर रहना आदि। यह बात ठीक भी जान पड़ती है मांसाहार जीवहत्या के बगैर संभव नहीं है। इसलिए दोनों ही हिंसा के category में आते है। अब सवाल उठता है की अहिंसा को क्यों यूँ एक सीमित दायरे में बाँधा जा सकता है? जी नहीं , अहिंसा का क्षेत्र बहुत बड़ा है और अहिंसा का संक्षेप में अर्थ है -समस्त हिंसक वृत्तियों का त्याग। कैसी है ये हिंसक वृतियां , इन्हे जानना होगा, समझना होगा। तभी हम उनसे मुक्ति पा सकते है । दुसरो को सताना, दुःख पहुचाना निश्चित रूप से हिंसा है। किन्तु क्या स्वयं को सातना हिंसा नहीं है?  आदमी तीन तरह के होते है पहला परपीड़क यानी ऐसे लोग जो दुसरो को सताकर सुकून का अनुभव करते है। दूसरा स्वपीड़क यानी आत्मपीडक ऐसे लोग दुसरो को न सताकर स्वयं को सताकर सुख का अनुभव करते है। ऐसे लोग धर्म के विश्वास में होकर अत्यधिक व्रत उपवास , काटो की सेज पर लेटना आदि से लेकर आत्महत्या तक कर डालने से ऐसे लोग नहीं चूकते । मेरी राय में अहिंसक वे है , जो इन दोनों के पार है। जो इन दोनों वृत्तियों का अतिक्रमण कर चूका है। यानी जो दुसरो को सताता नहीं और न ही स्वयं को सताता है, जो स्वस्थ व प्रसन्न भाव से संतोष पूर्वक जीता है। इसके अतिरिक्त कड़वे वचनो द्वारा हिंसा एक खतरनाक हिंसा है। कारण यह है की कड़वे वचन हमे यूँ ही चोट पहुचाते है की जीवन भर नहीं भूलते। मन में किया गया किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। यानी नकारत्मक विचार उठा की हिंसा हुई । कारण यह की मन में उठे विचार ही भविष्य में उठने वाले कृत्य की आधारशिला रखते है। हम पहले विचार करते है । शीघ्र ही भविष्य में वही विचार नए कर्म की पर

मृत्यु

जीवन के कार्यकलापो में हलचल और चकाचौंध यानि ध्वनि और प्रकाश का समावेश है। ये दोनों भौतिक अस्मिताएं है और इनका स्वरूप अस्थायी है। अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए इन्हें source चाहिए । दूसरे छोर पर मृत्यु ,शांति और अंधकार है।इनका अस्तित्व किसी के बुते पर नहीं टीका रहता, क्योकि इनकी प्रकृति दैविक है। नवजात शिशु के आगमन और हर्षोल्लास में मनुष्य तनिक भी यह विचार नहीं करता की जो आया है उसे जाना है। जीवन जन्म और मरण की छोटी सी यात्रा का दूसरा नाम है। मृत्यु से ज्यादा निश्चित कुछ भी नहीं है। छोटी सी सोच के लिए  मनुष्य  अस्थिर साधन जुटाने में  अपने परम target से भटक जाता है।इस प्रक्रिया में वह नकारत्मक, ईर्ष्या, लालच से ग्रस्त रहता है। आये दिन होती मौतों के सन्देश नहीं पढता है । मृत्यु दुनिया का सबसे बड़ा मौन शिक्षक है हमे कल मरना है इस दृष्टी से हम जीना सीख ले, तो जीवन सार्थक हो जायेगा । मृत्यु के सत्य को समझने वाला सत्कार्य में निरत रहता है। मृत्यु के उपरान्त सत्कर्मो की पूँजी साथ ले जाता है । वह जीवन पूरी तरह जीता है और कभी भी मरने के लिए तैयार रहता है वह जानता है की दुसरो की मौत पर पुष्प अर्पित करने से अधिक important है की उसे जीते जी पुष्प भेट करना है। 

मनुष्य को जीवन का विलोम नहीं , बल्कि अंग समझने से मृत्यु का भय नहीं सताता। जीवन की सबसे बड़ा नुकसान मृत्यु नहीं, बल्कि जीते जी हौसलो का खत्म हो जाना है। मौत से वे भयभीत होते है , जो जिंदगी से दूर भागते है । कहा गया है मृत्यु तो शान्तिप्रद होती है किन्तु इसका विचार मनुष्य को विचलित करता है। मृत्यु, आत्मा,परमात्मा का मिलान पल भर का है। जीवन और मृत्यु एक सिक्के के दो पहलु है । हमे केवल every moment का सदुपयोग करते रहना है। 

समय प्रबंधन

अनेक लोग है जो समय प्रबंधन के महत्व को समझते नहीं है। समय प्रबंधन को समझने वाले लोग बड़े चुस्त, फुर्तीले, और दृढ निश्चयी होते है। ऐसे लोग एक काम को पूरा करके तत्काल दूसरा कार्य हाथ में ले लेते है और उसे पूरा करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देते है। भविष्य ऐसे ही लोगो का होता हैं। यदि आप कार्य को तत्काल संपन्न करते है तो आप अनेक उलझनों से बच जाते  है । काम को तुरत फुरत संपन्न कर डालने की आदत से हमारी शक्तियां और योग्यताए संघठित रहती है।उनमे कभी भी बिखराव की संभावना नहीं रहती है  । काम को टाल देने की आदत से आगे चलकर कई जटिल समस्याएं उत्पन्न हो जाती है।अक्सर लोग काम को शुरू करने से पहले ही डर जाते है। उन्हें  यह शंका हरदम घेरे रहती है की वे यह काम पूरा कर पायेगे की नहीं। ऐसे लोग हरदम काम का बोझ लादे रहते है। किसी भी काम को नियत समयावधि में पूरा करने के लिए शुरू शुरू में आलस्य आता  है।यह बहुत स्वाभाविक है ऐसा इसलिए क्योकि आप अपनी एक पुरानी बुरी आदत बदल रहे होते है। मगर काम को शुरू कर दे तो यह आलस्य धीरे धीरे दूर होता जाता है। यदि कई काम है तो उनकी प्राथमिकता के आधार पर एक सूची बना ले। कम समय लगने वाले काम को सबसे निपटा ले। जो काम अन्य सभी से  भारी है उसके लिए एक ख़ास समय तय करे। कामो को क्रमबद्ध और व्यवस्थित ढंग से किया जाये तो चौबीस घंटे कम नहीं होते है। हमे इस बात पर विचार करना चाहिए की जीवन में सफल लोगो ने इन चौबीस घंटो का सही सही उपयोग कैसे किया। एक बार यदि आपने समय प्रबंधन की आदत डाल ली तो छोटा हो या बड़ा हर काम तय समय सीमा में पूरा हो जायेगा और दूसरा दिन आपके नए कामो के लिए पूरी तरह से खाली रहेगा । जब आप किसी काम को पूरा कर ले तो खुद ही संतोष करे। वस्तुतः टाल मटोल की आदत आपके जीवन का बहुत समय बर्बाद कर देती है। इस आदत के परिणाम स्वरुप हमारी आंतरिक शक्ति धीरे धीरे कम होने लगती है।

Saturday, 12 August 2017

आलोचना

आलोचना से कोई भी नहीं बच सकता । जो मनुष्य जितना बड़ा होता है, उसकी आलोचनाये भी उतनी ही बड़ी होती है। इसलिए आलोचना से घबराकर धैर्य नहीं खोना चाहिए । आलोचना दो प्रकार की होती है-रचनात्मक और विध्वंसात्मक। हर एक व्यक्ति को जीवन में किसी न किसी समय आलोचना का शिकार होना पड़ता है । आलोचक को कभी शत्रुता नहीं माननी चाहिए की वह बदनाम करने के लिए आरोप लगा रहा है।ऐसा सदैव नहीं रहता। भ्रम भी कारण हो सकता है। घटना का सही उद्देश्य सही रूप से न समझ पाने पर लोग मोटा अनुमान यही लगा लेते है की शत्रुतावश ऐसा कहा जा रहा है। निंदा करना वालो का इसमे घाटा ही रहता है। यदि उसकी बात सत्य है तो भी लोग चौकान्ने हो जाते है की कही हमारा भेद इसके हाथ हो नहीं लग गया है जिसे यह हर जगह बकता फिरे। झूठी निन्दा बड़ी बुरी मानी जाती है। निंदा सुनकर क्रोध आना और बुरा लगना स्वाभाविक है क्योकि इससे स्वयं के स्वाभिमान को चोट लगती है पर समझदार लोगो के लिए उचित है की ऐसे अवसरों पर धीरज से काम ले। आवेश में आकर विवाद न खड़ा करे। यह देखे की ऐसा अनुमान लगाने का अवसर उसे किस घटना या कारण से मिला। यदि उसमे व्यवहार कुशलता संबंधी भूल हो रही हो तो उससे बचकर रहे। यदि बात सर्वथा मनगढ़ंत सुनी सनाई है तो अवसर पाकर यह उन्ही से पूछना चाहिए की उसने इस प्रकार ग़लतफ़हमी क्यों उत्पन्न की  एक बार कारण तो पूछ लिया होता इतनी छोटी से बात के लिए उसका मुख भविष्य के लिए बंद हो जायेगा और यही कही बात सत्य है तो आत्म सुधार की बात सोचनी चाहिए। 

आलोचना की गई बातो को सत्यता की कसौटी पर कसे। प्राय: बातें असत्य होती है। कभी कभी आलोचना को accept कर लेना भी उचित होता है। यदि सत्य है तो accept करके सुधार कर लेना चाहिए। निरर्थक आलोचना को importance न दे और आगे बढ़ते रहे। आलोचना की विश्वासता को जाँचे। अनेक बार लोग केवल ईर्ष्या वश या लड़ाकर तमाशा देखने के लिए ही आलोचना करते है, इस पर कतई ध्यान न दे। आलोचना से स्वयं को सुधार करने का सुअवसर मिलता है। अपने मित्रो को मन की स्थिति का पता चलता है।