Tuesday, 1 August 2017

समस्याओं के निर्माता

समस्याओं को बड़ा चढ़ा कर देखना हमारी आदत होती है। समस्या एक पिचके गुब्बारे की तरह है। आप हवा भरेंगे तभी वह बड़ी होगी इससे बचना है तो खुद को बिल्कुल सामान्य रखना होगा। समस्याओं से खुद को अलग कर देखना होगा। जियो, नाचो, खाओ,सोओ । काम जितना हो सके समग्रता से करो और हमेशा इस बात का ख्याल रखो । की जब भी तुम देखो खुद को कोई समस्या निर्मित करते हुए ,उससे बाहर निकल जाओ।

तो बह चलो न।

दरअसल, इच्छशक्ति से हम जब कोई काम करते है, तो ऐसा लगता है मानो हम किसी उलट दिशा में बह रहे है, हमारा मन कुछ चाह रहा होता है और हम कर कुछ और रहे होते है। हमारा दिमाग कहता है की हमे यह करना है। और हमारा दिल उसके लिए तैयार नहीं होता है। फिर हमे लगता है की काम जरूरी है। उसे किसी हाल में करना है तब हमे इच्छशक्ति की जरुरत होती है। जब हम किसी काम को करने के लिए प्रेरित होते है,तो सब बदल जाता है। प्रेरणा हमे भीतर से जोश देती है,वह हमारे अंदर एक चिंगारी सुलगा देती है। तब हमारा दिल पूरी तरह हमारे साथ होता है उसी प्रेरणा की वजह से दिल और दिमाग एक हो जाते है। हम तब जो भी काम करते है,वह अपने आप बहाव में आ जाता है। और हम जानते है की जो काम हम बह कर करते है,वह कितनी तेज़ी से होता है।

बिना शर्त ख़ुशी।

सफलता की ख़ुशी ,साहस से कुछ हासिल करने की खुशी , परोपकार करने की ख़ुशी ,और सबके प्रति विनम्रता से जो ख़ुशी मिलती है इन सब खुशियो को हम भूल गए है। हम अपने अपने अंदर मौजूद ख़ुशी को ढूढ़ने के लिए ज्योतिषियो ,तान्त्रिकों और मांत्रिको के दरवाजे खटखटाने में लगे हुए है। ख़ुशी की हमारी यह खोज उनका कारोबार बढ़ा रही है। जो व्यक्ति आनंदित और तनावमुक्त रहेगा ,वह उतनी ही जल्दी मनचाही चीजो को प्राप्त कर लेगा। बात बात में हताश निराश होने वाले लोग जीवन में बहुत पीछे छूटते चले जाते है। आनंद के समय में आपकी जीवन ऊर्जा काम केंद्र से ऊपर मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होने लगती है। जबकि निराश के moment में मूलाधार की ओर जाने लगती है। यानि जो कुछ शाक्ति हैं आपकी वह विसर्जित होकर शरीर से बाहर चली जाती है। जिसने  भी शर्त लगाई है,वह शर्तो के चंगुल में फंसकर रह गया है। खुश रहना हमारी आदत में शामिल होना चाहिए था,जबकि उसकी जगह हताशा निराशा आकर बैठ गई है। खुश रहना सन्देह का कारण बनता जा रहा है। यह नजर्ये